<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>तीसरा खंबा</title>
	<atom:link href="http://www.teesarakhamba.com/feed" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://www.teesarakhamba.com</link>
	<description>विधि व न्याय को समर्पित प्रथम जालस्थल</description>
	<lastBuildDate>Sat, 19 May 2012 12:09:15 +0000</lastBuildDate>
	<language>en</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
	<generator>http://wordpress.org/?v=268</generator>
		<item>
		<title>सेवा से लंबी अनुपस्थिति को स्वेच्छा से सेवा का परित्याग माना जा सकता है</title>
		<link>http://www.teesarakhamba.com/archives/14995</link>
		<comments>http://www.teesarakhamba.com/archives/14995#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 19 May 2012 12:07:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दिनेशराय द्विवेदी</dc:creator>
				<category><![CDATA[Employment Law]]></category>
		<category><![CDATA[सेवा विधि]]></category>
		<category><![CDATA[Abandonment]]></category>
		<category><![CDATA[Absence]]></category>
		<category><![CDATA[Employment]]></category>
		<category><![CDATA[Misconduct]]></category>
		<category><![CDATA[Punishment]]></category>
		<category><![CDATA[service]]></category>
		<category><![CDATA[Termination]]></category>
		<category><![CDATA[अनुपस्थिति]]></category>
		<category><![CDATA[दंड]]></category>
		<category><![CDATA[दुराचरण]]></category>
		<category><![CDATA[नौकरी]]></category>
		<category><![CDATA[सेवा]]></category>
		<category><![CDATA[सेवा समाप्ति]]></category>
		<category><![CDATA[स्वेच्छा से सेवा का परित्याग]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.teesarakhamba.com/?p=14995</guid>
		<description><![CDATA[समस्या- मैं एक अर्धशासकीय निगम में लगातार 12 वर्ष तक अस्थाई रूपसे निर्धारित वेतन पर कार्यरत रहा था। इस दौरान मेरे वेतन से कर्मचारी भविष्य निधि की कटौती भी होती थी। पिछले 10 वर्षो से मैं घरेलू जिम्मेदारियों के कारण अपने कार्यालय से लापता रहा हूँ। इस दौरान मेरे साथ कार्यरत सभी साथियों को नियमित [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h6 style="text-align: justify;"><span style="color: #ff0000;">समस्या-</span></h6>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">मैं</span> एक अर्धशासकीय निगम में लगातार 12 वर्ष तक अस्थाई रूपसे निर्धारित वेतन पर कार्यरत रहा था। इस दौरान मेरे वेतन से कर्मचारी भविष्य निधि की कटौती भी होती थी। पिछले 10 वर्षो से मैं घरेलू जिम्मेदारियों के कारण अपने कार्यालय से लापता रहा हूँ। इस दौरान मेरे साथ कार्यरत सभी साथियों को नियमित कर दिया गया है। पिछले 10 वर्षों में मेरे कार्यालय ने मेरी सेवाएँ समाप्त करने के लिए कोई कार्यवाही नहीं की है। अभी मैं ने जब अपने कार्यालय से अपने भविष्य निधि खाते से धन निकालने हेतु संपर्क किया तो वहाँ से जवाब मिला कि पहले त्यागपत्र दो। लेकिन इस स्थिति को जानने के उपरान्त मैं त्यागपत्र नहीं देना चाहता और सेवा में वापस आना चाहता हूँ। इस सम्बन्ध में कानूनी स्थिति क्या होगी? मुझे क्या करना चाहिए।</p>
<p style="text-align: right;"><span style="font-size: medium;"><strong>-मुरारी संजय गोयल, बीना, मध्यप्रदेश</strong></span></p>
<h6 style="text-align: justify;"> <span style="color: #008000;">समाधान-</span></h6>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;"><a href="http://www.teesarakhamba.com/wp-content/uploads/2012/05/The-empty-chair.jpg"><img class="alignright  wp-image-14996" title="OLYMPUS DIGITAL CAMERA" src="http://www.teesarakhamba.com/wp-content/uploads/2012/05/The-empty-chair-225x300.jpg" alt="" width="126" height="169" /></a>कि</span>सी भी सेवा में निरन्तर बना रहना सेवा की एक स्थाई शर्त है। यदि कोई व्यक्ति बिना किसी सूचना के अनुपस्थित हो जाए तो सेवा में उसे तब तक लगातार अनुपस्थित माना जाएगा जब तक कि वह सेवा में स्वयं उपस्थित नहीं हो जाता है। यह भी हो सकता है कि कोई नियोजक एक लंबे समय तक अनुपस्थित रहने के कारण अनुपस्थित रहने वाले व्यक्ति की सेवाएँ समाप्त कर दे। आप के मामले में जो तथ्य सामने आए हैं उस से पता लगता है कि आप की सेवाएँ आप के निगम द्वारा समाप्त नहीं की गई हैं। लेकिन आप पिछले दस वर्ष से अनुपस्थित चल रहे हैं। आप ने वहाँ जा कर अपने भविष्य निधि खाते को बंद करने और उस में जमा धन वापस प्राप्त करने का प्रयास किया तो उन के सामने समस्या यह आ गई कि वे आप के भविष्य निधि खाते में आप की प्रास्थिति नौकरी से अनुपस्थित बताएँ अथवा आप को सेवामुक्त बताएँ। रिकार्ड के अनुसार आप आज तक सेवा मुक्त नहीं हैं। अनुपस्थित बताने से आप के भविष्य निधि खाते का समापन संभव नहीं है। इस कारण से आप को निगम द्वारा यह सलाह दी गई कि आप त्याग पत्र दे दें जिस से आप की प्रास्थिति ऐसी बन जाए कि आप के भविष्य निधि खाते का समापन हो सके और आप की भविष्य निधि की राशि आप को प्राप्त हो सके।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">य</span>दि कोई व्यक्ति बिना बताए सेवा से अनुपस्थित हो जाता है और एक लंबे समय तक अनुपस्थित रहता है तो नियोजक के पास यह आधार उपलब्ध रहता है कि कर्मचारी ने स्वयं ही सेवा त्याग दी है। इस तरह उस की सेवाएँ समाप्त समझी जा सकती हैं। दूसरा विकल्प यह है कि नियोजक एक लंबी अवधि तक अनुपस्थित रहने पर आप को आरोप पत्र दे कि आप बिना कोई सूचना दिए और बिना कोई कारण बताए अनुपस्थित हैं जो कि एक दुराचरण है, और आप इस आरोप का स्पष्टीकरण प्रस्तुत करें।  कर्मचारी का कोई भी उत्तर प्राप्त न होने पर नियोजक कर्मचारी के विरुद्ध औपचारिक जाँच कार्यवाही कर उसे सेवा समाप्ति के दंड से दंडित कर सकता है। आप के मामले में आप के नियोजक के पास उक्त दोनों ही विकल्प खुले हैं। एक तीसरा विकल्प यह भी है कि जब भी कर्मचारी सेवा पर उपस्थित हो उसे सेवा में ले ले और अनुपस्थिति के काल को उस के सेवा काल से हटा कर उस के कुल सेवाकाल की गणना कर ले। यह तीसरा विकल्प तभी संभव हो पाता है जब कि नियोजक को आप की सेवाओँ की आवश्यकता हो और नियोजक कर्मचारी के प्रति अत्यधिक सहिष्णुता का रवैया अपनाए।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">अ</span>ब आप के साथियों के नियमित हो जाने से उन्हें अच्छे वेतन प्राप्त हो रहे हैं और सेवा शर्तें भी अच्छी हैं इस कारण से आप नौकरी करना चाहते हैं। इस लिए मेरी राय में आप को सेवा में उपस्थिति दे देनी चाहिए। एक आवेदन प्रस्तुत कर यह बताना चाहिए कि आप किन कारणों से सेवा में उपस्थित नहीं हो सके थे और अब सेवा में उपस्थित हैं आप को सेवा में लिया जाए। यदि आप द्वारा बताए गए कारणों से आप का नियोजक संतुष्ट हो जाता है तो वह आप को तुरन्त सेवा में ले लेगा। यदि वह संतुष्ट नहीं होता है तो आप को पत्र दे कर यह बताएगा कि आप ने इतने दिन  अनुपस्थित रह कर स्वयं ही सेवा का त्याग कर दिया है और अब आप को सेवा में लिया जाना संभव नहीं है। आप की अनुपस्थिति को आप के नियोजक द्वारा स्वेच्छा से सेवा का परित्याग मान लिए जाने पर आप उस के विरुद्ध औद्योगिक विवाद उठा सकते हैं और इस विवाद में यदि श्रम न्यायालय यह मानता है कि आप के पास दस वर्ष की अनुपस्थिति का उचित कारण था और नियोजक को यह मानने का कोई अधिकार नहीं था कि आप ने सेवा का परित्याग कर दिया है तो आप को सेवा दुबारा प्राप्त हो सकती है। श्रम न्यायालय यदि यह मानता है कि आप का दस वर्ष से सेवा में अनुपस्थित रहना सेवा परित्याग के समान है तो आप को कोई भी राहत प्राप्त नहीं होगी। निर्णय बहुत कुछ आप और आप के नियोजक द्वारा श्रम न्यायालय के समक्षअपने अपने पक्ष में प्रस्तुत साक्ष्य पर निर्भर करेगा।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">य</span>ह आप पर निर्भर करता है कि आप सेवा से त्याग पत्र दे कर अपना हिसाब लेना चाहते हैं या फिर सेवा प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहते हैं।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.teesarakhamba.com/archives/14995/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>विक्रेता के नाम नामान्तरण न होने पर भी क्या उस से मकान खरीदने का अनुबंध किया जा सकता है ?</title>
		<link>http://www.teesarakhamba.com/archives/14988</link>
		<comments>http://www.teesarakhamba.com/archives/14988#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 18 May 2012 10:09:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दिनेशराय द्विवेदी</dc:creator>
				<category><![CDATA[Civil Law]]></category>
		<category><![CDATA[Legal Advice]]></category>
		<category><![CDATA[Property]]></category>
		<category><![CDATA[कानूनी सलाह]]></category>
		<category><![CDATA[विधि]]></category>
		<category><![CDATA[संपत्ति]]></category>
		<category><![CDATA[Advance Payment]]></category>
		<category><![CDATA[Agreement]]></category>
		<category><![CDATA[Breach of Contract]]></category>
		<category><![CDATA[Mutation]]></category>
		<category><![CDATA[sale]]></category>
		<category><![CDATA[अग्रिम राशि]]></category>
		<category><![CDATA[अनुबंध]]></category>
		<category><![CDATA[नामान्तरण]]></category>
		<category><![CDATA[विक्य]]></category>
		<category><![CDATA[संविदा भंग]]></category>
		<category><![CDATA[सपत्ति]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.teesarakhamba.com/?p=14988</guid>
		<description><![CDATA[समस्या- हम एक मकान पानीपत हरियाणा में खरीद रहे हैं। उक्त मकान के विक्रय का अनुबंध करने और अग्रिम राशि विक्रेता को देने के पहले हमने तहसील में पता किया तो उन्हों ने हमें  पटवारी के पास भेजा जिस ने हमें बताया कि जिस से आप मकान ले रहे हैं उस के नाम नामान्तरण (इन्तकाल) [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h6><span style="color: #ff0000;">समस्या-</span></h6>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">ह</span>म एक मकान पानीपत हरियाणा में खरीद रहे हैं। उक्त मकान के विक्रय का अनुबंध करने और अग्रिम राशि विक्रेता को देने के पहले हमने तहसील में पता किया तो उन्हों ने हमें  पटवारी के पास भेजा जिस ने हमें बताया कि जिस से आप मकान ले रहे हैं उस के नाम नामान्तरण (इन्तकाल) नहीं खुला है। उस के नाम इन्तकाल खुलने पर ही आप के नाम विक्रय पत्र पंजीकृत हो सकेगा। इन्तकाल खुलने में एक-दो माह का समय लगेगा। इस मामले में विक्रयमूल्य की 10-15 प्रतिशत राशि विक्रेता को दे कर उस से मकान खरीदने का अनुबंध करने में किसी तरह का कोई खतरा तो नहीं है? हमें क्या करना चाहिए?</p>
<p style="text-align: right;"><span style="color: #000080;"><strong><span style="font-size: medium;">-दीपक कुमार, पानीपत, हरियाणा</span></strong></span></p>
<h6></h6>
<h6><span style="color: #008000;">समाधान-</span></h6>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;"><a href="http://www.teesarakhamba.com/wp-content/uploads/2012/05/मकान.jpg"><img class="alignright  wp-image-14895" title="मकान" src="http://www.teesarakhamba.com/wp-content/uploads/2012/05/मकान-300x300.jpg" alt="" width="136" height="136" /></a>आ</span>म तौर पर जब भी कोई संपत्ति खरीदने के लिए अनुबंध किया जाता है तो विक्रेता कुछ राशि अग्रिम मांगता है। यह राशि यदि संपत्ति के मूल्य की 10 से 15 प्रतिशत हो तो इस तरह राशि का अग्रिम भुगतान कर के संपत्ति क्रय करने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन आप जिस मकान को खरीदना चाहते हैं उस का अभी बेचने वाले के नाम का ही नामांतरण राजस्व रिकार्ड में नहीं हुआ है। इस का अर्थ यह है कि विक्रेता ने पहले जिस व्यक्ति से मकान खरीदा था उस से विक्रय पत्र निष्पादित करवा कर उस का पंजीयन तो करवा लिया किन्तु उस के बाद राजस्व रिकार्ड में नामान्तरण नहीं करवाया है। यह भी सही है कि नामान्तरण होने में एक-दो माह या इस से भी अधिक समय लग सकता है और उस के बिना विक्रेता आप के नाम संपत्ति के विक्रय पत्र का पंजीयन नहीं करवा सकता।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">य</span>दि आप ने खरीदी जा रही समस्त संपत्ति के स्वामित्व के मूल दस्तावेज देख लिए हों और आप विश्वस्त हों कि वे सही हैं तो आप संपत्ति को क्रय करने का अनुबंध कर सकते हैं। लेकिन आप को यह विश्वास होना चाहिए कि जिस व्यक्ति के साथ आप यह अनुबंध कर रहे हैं वह संपत्ति का स्वामी है और बाद में अनुबंध का पालन अवश्य करेगा। इस के साथ ही जो विक्रय अनुबंध आप उस के साथ करना चाह रहे हैं उस में यह अवश्य लिखवाएँ कि विक्रेता अनुबंध की तिथि से निश्चित समय (दो या तीन या चार माह) में अपने नाम इन्तकाल खुलवा कर मकान के विक्रय पत्र निष्पादित कर देगा और उस का पंजीयन करवा देगा। यदि उस ने इस निश्चित अवधि में विक्रय पत्र का पंजीयन नहीं करवाया तो यह अनुबंध का अपखंडन माना जाएगा और वैसी स्थिति में विक्रेता आप को आप के द्वारा उसे अदा की गई अग्रिम राशि का दो गुना राशि अदा करेगा।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">य</span>दि विक्रेता समय पर विक्रय पत्र का पंजीयन नहीं करवाता है तो आप उसे नोटिस दे कर अग्रिम  भुगतान की गई धनराशि से दुगनी राशि की मांग कर सकते हैं। विक्रेता द्वारा यह राशि नहीं लौटाने पर आप उस के विरुद्ध संविदा का पालन न करने के लिए आप के द्वारा अदा की गई राशि की दुगनी राशि की वसूली के लिए वाद प्रस्तुत कर सकते हैं और कानूनन उस की वसूली कर सकते हैं। इस वाद के प्रस्तुत किए जाने के साथ ही आप उस संपत्ति को अटैच करवा सकते हैं जिस से आप की राशि की वसूली सुनिश्चित हो जाए।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.teesarakhamba.com/archives/14988/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>2</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>दिवंगत पिता की संपत्ति में माता और सभी पुत्र-पुत्रियों का समान हिस्सा है</title>
		<link>http://www.teesarakhamba.com/archives/14975</link>
		<comments>http://www.teesarakhamba.com/archives/14975#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 18 May 2012 00:21:44 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दिनेशराय द्विवेदी</dc:creator>
				<category><![CDATA[Legal Advice]]></category>
		<category><![CDATA[Property]]></category>
		<category><![CDATA[succession]]></category>
		<category><![CDATA[उत्तराधिकार]]></category>
		<category><![CDATA[कानूनी सलाह]]></category>
		<category><![CDATA[संपत्ति]]></category>
		<category><![CDATA[daughter]]></category>
		<category><![CDATA[Joint property]]></category>
		<category><![CDATA[Partition]]></category>
		<category><![CDATA[son]]></category>
		<category><![CDATA[Sucession]]></category>
		<category><![CDATA[wife]]></category>
		<category><![CDATA[पत्नी]]></category>
		<category><![CDATA[पुत्र]]></category>
		<category><![CDATA[पुत्री]]></category>
		<category><![CDATA[बँटवारा]]></category>
		<category><![CDATA[संयुक्त संपत्ति]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.teesarakhamba.com/?p=14975</guid>
		<description><![CDATA[समस्या- मेरी भाभी पाँच बहनें हैं। हमारी भाभी के पिता का अभी देहान्त हुआ है। उन्हों ने अपने जीवनकाल में काफी संपत्ति अर्जित की है। हमारी भाभी की आर्थिक स्थिति कमजोर है और आरंभ से वे ही माता-पिता की देखभाल कर रही थीं। भाभी के चार भाई हैं जो अलग अलग नौकरी करते हैं और [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h6 style="text-align: justify;"><span style="color: #ff0000;">समस्या-</span></h6>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">मे</span>री भाभी पाँच बहनें हैं। हमारी भाभी के पिता का अभी देहान्त हुआ है। उन्हों ने अपने जीवनकाल में काफी संपत्ति अर्जित की है। हमारी भाभी की आर्थिक स्थिति कमजोर है और आरंभ से वे ही माता-पिता की देखभाल कर रही थीं। भाभी के चार भाई हैं जो अलग अलग नौकरी करते हैं और अलग अलग रहते हैं। क्या उन के पिता की संपत्ति अपने आप माँ के नाम अन्तरित हो जाएगी? क्या हमारी भाभी का उस संपत्ति पर कोई अधिकार है? और यदि माता जी चाहे कि उन की लड़कियों का हिस्सा उन्हें मिले तो इस स्थिति में हमारी भाभी का अधिकार क्या होगा? क्या अपने आप या भाइयों की आपत्ति पर इस पर कोई रोक लग सकती है?</p>
<p style="text-align: right;"><span style="font-size: medium;">-विकी शुक्ला,</span></p>
<h6><span style="color: #008000;">समाधान-</span></h6>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;"><a href="http://www.teesarakhamba.com/wp-content/uploads/2012/05/Partition-of-property.jpg"><img class="alignright  wp-image-14979" title="Partition of property" src="http://www.teesarakhamba.com/wp-content/uploads/2012/05/Partition-of-property-300x219.jpg" alt="" width="180" height="131" /></a>य</span>दि आप की भाभी के पिता की संपत्ति यदि स्वअर्जित है और उन्हों ने अपनी संपत्ति के बारे में कोई वसीयत नहीं की है तो उन की संपत्ति उन की पत्नी, उन के पुत्रों और पुत्रियों सभी को समान रूप से प्राप्त होगी। जिस तरह की सूचना आपने दी है उस के अनुसार उन के पाँच पुत्रियाँ चार पुत्र तथा पत्नी हैं। इस तरह कुल दस उत्तराधिकारी हैं। इन दसों उत्तराधिकारियों में से प्रत्येक का उक्त संपत्ति में समान हिस्सा अर्थात 1/10 हिस्सा है। आप की भाभी के पिता के देहान्त के साथ ही उन की संपत्ति उन के उत्तराधिकारियों की संयुक्त संपत्ति हो चुकी है। सभी उत्तराधिकारी समान रूप से उस के हिस्सेदार हैं। उत्तराधिकारियों का यह हिस्सा जब तक संपत्ति का बँटवारा नहीं हो जाता है तब तक किसी को प्राप्त नहीं होगा संपत्ति संयुक्त बनी रहेगी। इस संपत्ति में आप की भाभी का हिस्सा भी 1/10 ही है।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">इ</span>न दसों उत्तराधिकारियों में से कोई भी एक दूसरे के अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता। हाँ, कोई भी अपना हिस्सा दूसरे के हक में छोड़ सकता है। आप के कथन से ऐसा प्रतीत होता है कि सारी संपत्ति वर्तमान में आप की भाभी की माताजी के कब्जे में है लेकिन उन का हिस्सा उक्त संपत्ति में केवल 1/10 है। वे अधिक से अधिक अपने हिस्से को किसी के हक में छोड़ सकती हैं, लेकिन संपत्ति का स्वामित्व संयुक्त होने के कारण वे व्यवहारिक रूप से संपत्ति का कोई भाग किसी को दे नहीं सकतीं।  यदि वे देना भी चाहें तो आपके भाई उस पर आपत्ति कर सकते हैं कि जब तक बँटवारा नहीं हो जाता है तब तक वे किसी को संपत्ति नहीं दे सकती हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">उ</span>क्त संपत्ति के दसों भागीदार चाहें तो आपस में मिल बैठ कर संपत्ति का सहमति के साथ ऐसा बँटवारा कर सकते है जो सभी को मान्य हो। लेकिन दस हिस्सेदार होने के कारण व्यवहारिक रूप से यह संभव नहीं लगता है। यदि आप की भाभी उक्त संपत्ति में से अपना हिस्सा चाहती हैं तो सब से अच्छा उपाय तो यह है कि आप की भाभी उक्त संपत्ति का बँटवारा कर के उन्हे उन का हि्स्सा देने की बात करें। यदि आपसी सहमति से बँटवारा करने को सब तैयार न हों तो वे जिला न्यायाधीश के न्यायालय में बँटवारे का वाद प्रस्तुत करें।</p>
<h4>Incoming search terms:</h4><ul><li>पुश्तैनी संपत्ति में महिला का हिस्सा कानून</li></ul>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.teesarakhamba.com/archives/14975/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>2</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>पति पत्नी व बच्चों को छोड़ कर दूसरा विवाह कर ले तो पत्नी क्या-क्या कर सकती है?</title>
		<link>http://www.teesarakhamba.com/archives/14969</link>
		<comments>http://www.teesarakhamba.com/archives/14969#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 16 May 2012 23:46:28 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दिनेशराय द्विवेदी</dc:creator>
				<category><![CDATA[Hindu]]></category>
		<category><![CDATA[Law]]></category>
		<category><![CDATA[marriage]]></category>
		<category><![CDATA[विधि]]></category>
		<category><![CDATA[विवाह]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दू]]></category>
		<category><![CDATA[10]]></category>
		<category><![CDATA[125]]></category>
		<category><![CDATA[24]]></category>
		<category><![CDATA[406]]></category>
		<category><![CDATA[494]]></category>
		<category><![CDATA[498-A]]></category>
		<category><![CDATA[9]]></category>
		<category><![CDATA[children]]></category>
		<category><![CDATA[Cr.P.C.]]></category>
		<category><![CDATA[Crime]]></category>
		<category><![CDATA[Hindu Marriage Act]]></category>
		<category><![CDATA[Husband]]></category>
		<category><![CDATA[Indian Penal Code]]></category>
		<category><![CDATA[maintenance]]></category>
		<category><![CDATA[Punishment]]></category>
		<category><![CDATA[Sec.]]></category>
		<category><![CDATA[wife]]></category>
		<category><![CDATA[दंड]]></category>
		<category><![CDATA[दंड प्रक्रिया संहिता]]></category>
		<category><![CDATA[दूसरा विवाह]]></category>
		<category><![CDATA[धारा]]></category>
		<category><![CDATA[पति]]></category>
		<category><![CDATA[पत्नी]]></category>
		<category><![CDATA[बच्चे]]></category>
		<category><![CDATA[भरण-पोषण]]></category>
		<category><![CDATA[भारतीय दंड संहिता]]></category>
		<category><![CDATA[हिन्दू विवाह अधिनियम]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.teesarakhamba.com/?p=14969</guid>
		<description><![CDATA[समस्या -  हमारी शादी को 7 साल हुए हैं। मेरा पति दो साल से भागा हुआ है और अलग रह रहा है,  उस ने तलाक का केस फाइल कर रखा है। लेकिन मैं उस से किसी भी कीमत पर तलाक नहीं देना चाहती हूँ। क्यों कि मेरे दो बच्चे हैं एक लड़का और एक लड़की। [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: justify;">
<h6><span style="color: #ff0000;">समस्या - </span></h6>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">ह</span>मारी शादी को 7 साल हुए हैं। मेरा पति दो साल से भागा हुआ है और अलग रह रहा है,  उस ने तलाक का केस फाइल कर रखा है। लेकिन मैं उस से किसी भी कीमत पर तलाक नहीं देना चाहती हूँ। क्यों कि मेरे दो बच्चे हैं एक लड़का और एक लड़की। मैं अभी मायके में रह रही हूँ और हमारा सारा खर्चा मेरा और मेरे बच्चों का मेरे माता पिता ही उठा रहे हैं। मुझे अब पता चला है कि उस ने (पति ने) दूसरी शादी कर ली है, जिस में उस के माता-पिता का हाथ भी है। लेकिन बिना तलाक दिए कोई दूसतरी शादी कैसे कर सकता है? क्या उस की दूसरी पत्नी उस की जायज पत्नी हो सकती है? मैं उसे और उस के घरवालों को कानून के द्वारा सजा दिलाना चाहती हूँ और अपने बच्चों का हक लेना चाहती हूँ। इस के लिए मुझे क्या करना होगा?</p>
<p style="text-align: right;"><span style="color: #000080;"><strong><span style="font-size: medium;">-राखी उनियाल, देहरादून, उत्तराखंड</span></strong></span></p>
<h6><span style="color: #008000;">समाधान-</span><span style="font-size: xx-large;"><img class="alignright" src="http://teesarakhamba.com/wp-content/uploads/2011/12/two+vives1.jpg" alt="" width="180" height="175" /></span></h6>
<p><span style="font-size: xx-large;">को</span>ई भी व्यक्ति स्त्री या पुरुष अपने विवाहित पति या पत्नी के जीवित रहते दूसरा विवाह नहीं कर सकता। ऐसा विवाह हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत एक अवैधानिक विवाह है। ऐसा करना धारा 494 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध भी है जिस के लिए ऐसा विवाह करने वाले व्यक्ति को सात वर्ष तक के कारावास और जुर्माने के दण्ड से दण्डित किया जा सकता है। इस धारा के अंतर्गत पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई जा सकती है और पुलिस अन्वेषण कर के ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल कर सकती है। ऐसे मामले में पुलिस द्वारा रिपोर्ट दर्ज न किए जाने पर न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत किया जा सकता है जिसे न्यायालय पुलिस को अन्वेषण के लिए प्रेषित कर सकता है या स्वयं भी जाँच कर के ऐसे व्यक्ति को अभियुक्त मानते हुए उस के विरुद्ध समन या गिरफ्तारी वारण्ट जारी कर सकता है। लेकिन इस मामले में आप को या पुलिस को न्यायालय के समक्ष यह प्रमाणित करना होगा कि आप के पति ने वास्तव में विधिपूर्वक दूसरा विवाह किया है इस संबंध में आप को दूसरे विवाह का प्रमाण पत्र तथा उसे जारी करने वाले अधिकारी की गवाही करानी होगी अथवा ऐसे प्रत्यक्षदर्शी गवाह प्रस्तुत करने होंगे जिन के सामने विवाह संपन्न हुआ हो।</p>
</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">आ</span>प दो वर्ष से अपने माता पिता के साथ रह रही हैं। आप को चाहिए था कि आप अपने पति के विरुद्ध धारा-9 हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत वैवाहिक संबंधों की प्रत्यास्थापना के लिए अथवा उस के दूसरा विवाह करने की सूचना मिल जाने पर धारा 10 हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत न्यायिक पृथ्थकरण के लिए आवेदन करतीं। आप अब भी इन दोनों धाराओँ में से किसी एक के अंतर्गत कार्यवाही कर सकती हैं।  आप अपने लिए और अपने बच्चों के भरण पोषण राशि प्राप्त करने के लिए धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत आवेदन कर सकती हैं। आप इस के साथ ही महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत भी अपने लिए और अपने बच्चों के लिए भरण पोषण राशि प्राप्त करने के लिए आवेदन कर सकती हैं। आप के पति ने आप के विरुद्ध तलाक का जो मुकदमा चलाया है उस मुकदमें में भी आप हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 24 के अंतर्गत मुकदमे पर आने जाने और वकील की फीस व मुकदमे के खर्चे और अपने व अपने बच्चों के भरण पोषण के लिए आवेदन कर सकती हैं। इस धारा के अंतर्गत आप के पति से मुकदमे के लंबित रहने के दौरान उक्त राहत दिलाई जा सकती है, लेकिन यह राहत मुकदमा समाप्त होने के बाद जारी नहीं रहेगी।</div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"></div>
<div style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">आ</span>प के पति ने जिस महिला के साथ दूसरा विवाह किया है वह विवाह अवैधानिक है और वह स्त्री वैध रूप से आप के पति की पत्नी नहीं है, वह किसी भी रूप में आप के पति की जायज पत्नी नहीं है। इस मामले में हो सकता है आप के पति के माता पिता ने आप के पति का सहयोग किया हो आप उन के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर सकती। यदि आप के पति के माता पिता व अन्य संबंधियों ने आप के प्रति कोई क्रूरता की हो तो उन के विरुद्ध आप पुलिस में धारा 498-ए भा.दं. संहिता के अंतर्गत मुकदमा दर्ज करवा सकती हैं। इसी के साथ यदि आप का कोई स्त्री धन आप के पति या उस के किसी रिश्तेदार के पास हो और वह आप को वापस नहीं लौटा रहा हो तो धारा 406 अमानत में खयानत का आरोप भी जोड़ सकती हैं। इस मामले में पुलिस द्वारा कार्यवाही न करने पर आप न्यायालय में भी शिकायत कर सकती हैं। इस मामले में आप के पति के रिश्तेदारों को सजा हो सकती है।</div>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.teesarakhamba.com/archives/14969/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>5</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>क्रेताओं के विरुद्ध वाद कारण विक्रय पत्र के पंजीयन की तिथि पर उत्पन्न होगा</title>
		<link>http://www.teesarakhamba.com/archives/14962</link>
		<comments>http://www.teesarakhamba.com/archives/14962#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 15 May 2012 16:40:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दिनेशराय द्विवेदी</dc:creator>
				<category><![CDATA[Civil Law]]></category>
		<category><![CDATA[Legal Advice]]></category>
		<category><![CDATA[Property]]></category>
		<category><![CDATA[कानूनी सलाह]]></category>
		<category><![CDATA[दीवानी विधि]]></category>
		<category><![CDATA[संपत्ति]]></category>
		<category><![CDATA[Joint property]]></category>
		<category><![CDATA[Limitation Act]]></category>
		<category><![CDATA[Preferential Right]]></category>
		<category><![CDATA[sale]]></category>
		<category><![CDATA[अधिमान्य अधिकार]]></category>
		<category><![CDATA[अवधि विधान]]></category>
		<category><![CDATA[विक्रय]]></category>
		<category><![CDATA[संयुक्त संपत्ति]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.teesarakhamba.com/?p=14962</guid>
		<description><![CDATA[समस्या - एक वाद  अधिमान्य अधिकार Preferential Right हेतु विचाराधीन है जो अविभाजित हिन्दू पैत्रृक संपत्ति का है इसके ४ सहस्वामी है वाद प्रस्तुति के बाद ३ सहस्वामी ने इस सम्पत्ति को आपस में मिलकर ४ क्रेताओं को विक्रय कर दिया। इस वाद में जो ४ क्रेता है उन में से एक क्रेता वाद प्रस्तुति [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h6 style="text-align: justify;"><span style="color: #ff0000;">समस्या -</span></h6>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">ए</span>क वाद  अधिमान्य अधिकार Preferential Right हेतु विचाराधीन है जो अविभाजित हिन्दू पैत्रृक संपत्ति का है इसके ४ सहस्वामी है वाद प्रस्तुति के बाद ३ सहस्वामी ने इस सम्पत्ति को आपस में मिलकर ४ क्रेताओं को विक्रय कर दिया। इस वाद में जो ४ क्रेता है उन में से एक क्रेता वाद प्रस्तुति के समय से ही वाद में पक्षकार रहा है और उसने अपने पुत्र भाई एवं भतीजे के नाम से विक्रय पत्र सम्पादित किए हैं। वादी ने यह वाद प्रस्तुत किया कि वादग्रस्त सम्पत्ति में उसका १/४ स्वत्व है और शेष ३/४ स्वत्व क्रय करने का अधिमान्य अधिकार (Preferential Right है।  वाद प्रस्तुति के बाद में विक्रय पत्र का पंजीयन हुआ इस कारण से अन्य ३ क्रेताओं को बाद में पक्षकार बनाने हेतु आवेदन प्रस्तुत किया गया।  हालाँकि एक आवेदन आदेश १ नियम १० दीवानी प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत तत्काल प्रस्तुत कर दिया था और उस का आदेश होने पर आदेश ६ नियम १७ दीवानी प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत पक्षकारों के नाम जोड़ने हेतु प्रस्तुत कर दिया था लेकिन इस आवेदन पर आदेश आने में २ वर्ष का समय लगा। मेरे प्रश्न  हैं कि इस वाद में Limitation Act का प्रभाव क्या होगा? क्या वाद में एक क्रेता पक्षकार समयावधि में है और अन्य समय बाधित हैं? क्या वाद प्रस्तुति दिनांक और संशोधन दिनांक, दोनों तिथियाँ लिमिटेशन को प्रभावित करती हैं? इस परेशानी का अन्य कोई उपाय क्या है?</p>
<p><span style="font-size: medium;">-राजेश, इन्दौर, मध्यप्रदेश</span></p>
<h6><span style="color: #008000;">समाधान-</span></h6>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;"><a href="http://www.teesarakhamba.com/wp-content/uploads/2012/05/Joint-property.jpg"><img class="alignright  wp-image-14964" title="Joint property" src="http://www.teesarakhamba.com/wp-content/uploads/2012/05/Joint-property.jpg" alt="" width="154" height="153" /></a>ए</span>क चार व्यक्तियों के संयुक्त स्वामित्व की संपत्ति को उस के तीन स्वामियों ने विक्रय कर दिया। आप उस के विरुद्ध यह वाद ले कर आए कि उस संपत्ति को वे विक्रय नहीं कर सकते क्यों कि उस संपत्ति में 1/4 हिस्सा आप का भी है। उस के अलावा आप ने यह भी कहा कि वे यदि अपने हिस्से विक्रय करना चाहते हैं तो आप को उन के 3/4 भाग को क्रय करने का अधिकार है। उन तीन हिस्सेदारों ने जब विक्रय का अनुबंध किया तभी आप ने उन के विरुद्ध तथा अनुबंध करने वाले व्यक्ति के विरुद्ध  वाद प्रस्तुत कर दिया। इस वाद के लिए वाद कारण या तो उक्त संपत्ति को बेचे जाने की आशंका से उत्पन्न हुआ या फिर उन के बीच हुए लिखित अनुबंध से। आप ने अपने वाद में  वाद कारण क्या लिखा है यह तो आप ही बेहतर जानते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">वा</span>द प्रस्तुत करने के उपरान्त उक्त संपत्ति के तीन भागीदारों ने उक्त संपत्ति के विक्रय पत्र का पंजीयन करवा दिया। उस पंजीयन से आप को पता लगा कि उक्त संपत्ति किन व्यक्तियों को विक्रय की गई है। जिस दिन आप को यह पता लगा कि उक्त संपत्ति क्रय करने वाले अन्य लोग कौन हैं, उसी दिन उन व्यक्तियों के विरुद्ध वाद कारण उत्पन्न हो गया। आप द्वारा पहले से प्रस्तुत किए गए वाद में विक्रय पत्र का निष्पादन और पंजीयन पश्चातवर्ती घटनाएँ थीं। दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 6 नियम 17 तथा  आदेश 1 नियम 10 के अंतर्गत पश्चातवर्ती घटनाओं के आधार पर आदेश पारित किया जा सकता है। यदि आप ने उक्त दोनों प्रार्थना पत्र विक्रय पत्र के पंजीयन की तिथि से या उस के बाद आप द्वारा उस की जानकारी होने की तिथि से तीन वर्ष की अवधि के भीतर प्रस्तुत किए हैं तो आप के वाद पर अवधि अधिनियम  के उपबंधों का कोई प्रभाव नहीं होगा। आप के समक्ष वास्तव में कोई परेशानी नहीं है।</p>
<h4>Incoming search terms:</h4><ul><li>कानूनी समस्या और समाधान सलाह</li></ul>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.teesarakhamba.com/archives/14962/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>मित्र और उस की पत्नी का घर बसाने का प्रयत्न करें</title>
		<link>http://www.teesarakhamba.com/archives/14956</link>
		<comments>http://www.teesarakhamba.com/archives/14956#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 14 May 2012 11:51:39 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दिनेशराय द्विवेदी</dc:creator>
				<category><![CDATA[Law]]></category>
		<category><![CDATA[marriage]]></category>
		<category><![CDATA[विधि]]></category>
		<category><![CDATA[विवाह]]></category>
		<category><![CDATA[Counselling]]></category>
		<category><![CDATA[divorce]]></category>
		<category><![CDATA[separation]]></category>
		<category><![CDATA[wife]]></category>
		<category><![CDATA[काउंसलिंग]]></category>
		<category><![CDATA[पत्नी]]></category>
		<category><![CDATA[पार्थक्य]]></category>
		<category><![CDATA[विवाह विच्छेद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.teesarakhamba.com/?p=14956</guid>
		<description><![CDATA[समस्या- मेरे एक मित्र की शादी 2009 में हुई थी. पिछले वर्ष अप्रैल में उसकी पत्नी मायके गयी तो अभी तक नहीं आई। पत्नी को सास ससुर से शिकायत है। मेरा मित्र उसे अलग रखने को तैयार है लेकिन अब वह नहीं आरही है। ऐसे में मेरा मित्र विवाह विच्छेद के लिए कहता है तो [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h6><span style="color: #ff0000;">समस्या-</span></h6>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">मे</span>रे एक मित्र की शादी 2009 में हुई थी. पिछले वर्ष अप्रैल में उसकी पत्नी मायके गयी तो अभी तक नहीं आई। पत्नी को सास ससुर से शिकायत है। मेरा मित्र उसे अलग रखने को तैयार है लेकिन अब वह नहीं आरही है। ऐसे में मेरा मित्र विवाह विच्छेद के लिए कहता है तो उस की पत्नी उसे दहेज एक्ट में फँसाने को कहती है&#8230; मेरे मित्र को क्या करना चाहिए?</p>
<p style="text-align: right;"><span style="font-size: medium; color: #000080;"><strong>-मुकेश पाठक, रामपुर, उत्तरप्रदेश</strong></span></p>
<h6><span style="color: #008000;">समाधान-</span></h6>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;"><img class="alignright" src="http://teesarakhamba.com/wp-content/uploads/2012/02/Desertion-marriage.jpg" alt="" width="117" height="176" />आ</span>प के मित्र की पत्नी को अपने सास ससुर से शिकायत है इसी कारण वह अपने मायके चली गयी है। आप का मित्र अब उसे अलग रखने को तैयार है। इस का सीधा सीधा अर्थ यही है कि कोई ठोस कारण है जिस के कारण पत्नी ने आप के मित्र का साथ छोड़ दिया है। अक्सर ऐसा होता है कि विवाह के उपरान्त एक लड़की ससुराल जाती है तो उस से वैसे ही व्यवहार की अपेक्षा की जाती है जैसा आज से 10-20-30 वर्ष पहले की स्त्रियाँ अपनी ससुराल में करती थीं। अक्सर उसे ताने सुनने को मिलते हैं। कहीं विवाह हो और वहाँ अच्छा दहेज आया हो तो उस का वर्णन परिवार में इस तरह से किया जाता है कि एक लड़की जो उस से कम दहेज लाई हो वह हीन भावना से ग्रसित हो जाती है। कुल मिला कर कुछ तो गड़बड़ है। इस गड़बड़ को दुरुस्त करने का प्रयास करना चाहिए। मुझे लगता है कि जब पत्नी के साथ सास-ससुर द्वारा सही व्यवहार नहीं किया गया तब पत्नी ने अपने पति का साथ चाहा और उसे पति का साथ नहीं मिला। यहीँ पति में पत्नी का विश्वास डिग गया है। पत्नी के वापस आ कर रहने से इन्कार कर देने पर सीधे तलाक की बात कर देने से पत्नी ने तुरन्त प्रतिक्रिया यही दी कि वह दहेज का मुकदमा कर देगी। उस के पास आखिर हथियार क्या है?</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">प</span>त्नी पति को छोड़ना नहीं चाहती लेकिन उस में बदलाव चाहती है। आप के मित्र को अपनी पत्नी को बदलाव का विश्वास दिलाना चाहिए था जब कि उस ने सीधे तलाक की बात कर दी। इस से आपसी विश्वास को गंभीर क्षति पहुँची है। आप के मित्र के पास तलाक का कोई कारण नहीं है और भारतीय समाज में जिस तरीके से विवाह होते हैं और जिस तरीके से एक पुत्रवधू के साथ व्यवहार किया जाता है धारा 498 ए तथा 406 दं.प्र.संहिता का हथियार सहज ही पत्नियों को उपलब्ध रहता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">आ</span>प के मित्र को चाहिए कि वह अपने व्यवहार से यह सिद्ध करे कि वह अपनी पत्नी का सही साथी साबित होगा। इस काम में आप मित्र होने के कारण अपने मित्र की सहायता कर सकते हैं। आप अपने मित्र और उस की पत्नी के बीच जो दूरियाँ उत्पन्न हो गई हैं उन्हें दूर करने का भी प्रयत्न कर सकते हैं। वास्तव में दोनों को काउंसलिंग की आवश्यकता है।  यह काम आप स्वयं भी कर सकते हैं और दोनों को काउंसलर उपलब्ध करवा कर भी यह काम कर सकते हैं। वैसे भी आप की मित्रता का धर्म भी यही है कि आप उन की गृहस्थी को बचाएँ।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">व</span>र्तमान में आप के पति के पास तलाक के लिए कोई आधार नहीं है। वे यदि कोई कार्यवाही अदालत में करते हैं चाहे वह तलाक के लिए हो या फिर वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना की। उन पर धारा 498 ए और 406 के मुकदमे की तलवार तो लटकी ही रहेगी। आप को दोनों को मिलाने के लिए प्रयास करना चाहिेए।</p>
<h4>Incoming search terms:</h4><ul><li>सूचना का अधिकार कानून</li></ul>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.teesarakhamba.com/archives/14956/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>अतिक्रमी को हटाने और अपनी भूमि का कब्जा प्राप्त करने के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत करें</title>
		<link>http://www.teesarakhamba.com/archives/14954</link>
		<comments>http://www.teesarakhamba.com/archives/14954#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 13 May 2012 23:51:47 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दिनेशराय द्विवेदी</dc:creator>
				<category><![CDATA[Civil Law]]></category>
		<category><![CDATA[possession]]></category>
		<category><![CDATA[दीवानी विधि]]></category>
		<category><![CDATA[संपत्ति]]></category>
		<category><![CDATA[Encroachment]]></category>
		<category><![CDATA[land]]></category>
		<category><![CDATA[Limitation]]></category>
		<category><![CDATA[Suit for Possession]]></category>
		<category><![CDATA[अतिक्रमण]]></category>
		<category><![CDATA[अवधि सीमा]]></category>
		<category><![CDATA[कब्जा]]></category>
		<category><![CDATA[कब्जा प्राप्त करने का वाद]]></category>
		<category><![CDATA[भूमि]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.teesarakhamba.com/?p=14954</guid>
		<description><![CDATA[समस्या- हमारा पैतृक मकान जिस कॉलोनी में है वह आज से लगभग ४० साल पुरानी बसी हुई है, ४० वर्ष पहले सरकार द्वारा उक्त कॉलोनी में लगभग 400 परिवारों को (16&#215;50)  800 वर्गफुट के प्लाट पर एक कमरा निर्मित कर के दिया था एवं उस समय हमें मकान के कागज दिए थे उस पर भी [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h6><span style="color: #ff0000;">समस्या-</span></h6>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;"><a href="http://www.teesarakhamba.com/wp-content/uploads/2012/05/मकान.jpg"><img class="alignright  wp-image-14895" title="मकान" src="http://www.teesarakhamba.com/wp-content/uploads/2012/05/मकान-300x300.jpg" alt="" width="108" height="108" /></a>ह</span>मारा पैतृक मकान जिस कॉलोनी में है वह आज से लगभग ४० साल पुरानी बसी हुई है, ४० वर्ष पहले सरकार द्वारा उक्त कॉलोनी में लगभग 400 परिवारों को (16&#215;50)  800 वर्गफुट के प्लाट पर एक कमरा निर्मित कर के दिया था एवं उस समय हमें मकान के कागज दिए थे उस पर भी भूखंड का यही साइज़ अंकित था, परन्तु उन ४०० मकानों में हमारे कुछ मकानों के आगे कुछ लोगों द्वारा अतिक्रमण कर लिया गया जिससे हमारे मकान की साइज़ घटकर मात्र ५५० फिट ही बची है। उक्त कालोनी के नगर पालिका के मानचित्र में भी हमारे मकान की साइज़ ८०० फिट ही दर्शाई हुई है। हम अपनी ज़मीन पर उक्त अतिक्रमण किस तरीके से हटवा सकते हैं? क्या क्या हम अदालत में कार्यवाही क़र सकते हैं?</p>
<p style="text-align: right;"><span style="font-size: medium; color: #000080;">-मनीष कुमार, इन्दौर, मध्यप्रदेश</span></p>
<h6>समाधान-</h6>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">आ</span>प ने अपने प्रश्न में यह नहीं बताया है कि आप की भूमि पर जो अतिक्रमण किया गया है वह किस तरह से किया गया है अर्थात भूखंड के अतिक्रमित भाग पर क्या स्थित है, कोई स्थाई निर्माण है अथवा अस्थाई निर्माण है?  आप ने यह भी नहीं बताया है कि यह अतिक्रमण कब से है। किसी भी मामले में कानूनी कार्यवाही करने के लिए यह जानना आवश्यक है कि जिस त्रुटिपूर्ण कार्य के विरुद्ध आप अदालत में कार्यवाही करने जा रहे हैं वह कब हुआ था। मसलन कोई आप के साथ मारपीट कर दे और आप दो-तीन वर्ष बाद उस के विरुद्ध न्यायालय में शिकायत प्रस्तुत करें तो न्यायालय सब से पहले यही कहेगा कि आप इतने दिन कहाँ बैठे रहे?  न्यायालय यह भी मान सकता है कि आप ने मारपीट करने वाले को माफ कर दिया। इसी तरह इस मामले में भी न्यायालय यह मान सकता है कि आप ने स्वयं ही अतिक्रमणकारी को अपनी भूमि पर कब्जा करने दिया। न्याय प्राप्त करने का एक सिद्धान्त यह है कि आप को जितना जल्दी हो न्यायालय के समक्ष अपने मामले को लाना चाहिए। इस के लिए एक कानून अवधि अधिनियम (Limitation Act 1963) बनाया गया है। जिस में यह निर्धारित है कि किस मामले में कितनी अवधि के अंदर आप कानूनी कार्यवाही न्यायालय के समक्ष संस्थित कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">आ</span>प का मामला आप की भू्मि पर अतिक्रमी द्वारा अवैध रूप से कब्जा कर लेने तथा उस पर से उस अवैध कब्जे को हटवाने का है। यदि यह कब्जा किए हुए दो माह से कम समय हुआ है तो आप तुरंत अपने क्षेत्र के कार्यपालक मजिस्ट्रेट को धारा 145 दं.प्र.संहिता के अंतर्गत शिकायत कर सकते हैं और कब्जे को हटवा सकते हैं। लेकिन ऐसा लगता है कि उक्त अतिक्रमण अधिक समय से है और आप इस उपबंध के अंतर्गत कार्यवाही नहीं कर सकते।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">आ</span>प का उक्त भूमि पर स्वामित्व है। आप अपनी भूमि पर किए गए कब्जे को हटवाने और अपनी भूमि पर पुनःकब्जा प्राप्त करने के लिए दीवानी न्यायालय में कब्जे का वाद प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के लिए आप को कब्जा की गई भू्मि के वर्तमान बाजार मूल्य पर न्यायालय शुल्क अदा करना होगा। इस वाद के द्वारा आप अपनी भूमि पर कब्जा वापस प्राप्त कर सकते हैं। इस के लिए आप को तुरन्त किसी अनुभवी वकील से सलाह कर के वाद प्रस्तुत कर देना चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.teesarakhamba.com/archives/14954/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>अनुकंपा नियुक्ति के लिए मना कर देने पर उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका प्रस्तुत करें</title>
		<link>http://www.teesarakhamba.com/archives/14946</link>
		<comments>http://www.teesarakhamba.com/archives/14946#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 13 May 2012 11:59:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दिनेशराय द्विवेदी</dc:creator>
				<category><![CDATA[Employment Law]]></category>
		<category><![CDATA[सेवा विधि]]></category>
		<category><![CDATA[Compenssionate Appointment]]></category>
		<category><![CDATA[Legal Advice]]></category>
		<category><![CDATA[अनुकंपा नियुक्ति]]></category>
		<category><![CDATA[कानूनी सलाह]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.teesarakhamba.com/?p=14946</guid>
		<description><![CDATA[समस्या- मेरी माताजी केंटोनमेंट बोर्ड में सरकारी नौकरी करती थीं। उन का देहान्त दिनांक 20.12.2008 को हो गया है दिनांक 03.02.2009 को मैं ने अनुकम्पा के आधार पर नौकरी में नियुक्ति हेतु प्रार्थना पत्र दिया था। लेकिन केंटोनमेंट बोर्ड के सीईओ ने दिनांक 01.12.2011 को एक पत्र द्वारा सूचित किया है कि शासन ने ग्रुप [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h6 style="text-align: justify;"><span style="color: #ff0000;">समस्या-</span></h6>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">मे</span>री माताजी केंटोनमेंट बोर्ड में सरकारी नौकरी करती थीं। उन का देहान्त दिनांक 20.12.2008 को हो गया है दिनांक 03.02.2009 को मैं ने अनुकम्पा के आधार पर नौकरी में नियुक्ति हेतु प्रार्थना पत्र दिया था। लेकिन केंटोनमेंट बोर्ड के सीईओ ने दिनांक 01.12.2011 को एक पत्र द्वारा सूचित किया है कि शासन ने ग्रुप डी में अनुकंपा नियुक्ति बंद कर दी है। मुझे क्या करना चाहिए?</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="color: #000080;"><strong><span style="font-size: medium;">-राजू पटेल, कानपुर, उत्तरप्रदेश</span></strong></span></p>
<h6 style="text-align: justify;"><span style="color: #008000;">समाधान-</span></h6>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;"><a href="http://www.teesarakhamba.com/wp-content/uploads/2012/05/Job-application.jpg"><img class="alignright  wp-image-14947" title="Job-application" src="http://www.teesarakhamba.com/wp-content/uploads/2012/05/Job-application-300x199.jpg" alt="" width="256" height="169" /></a>आ</span>प को केंटोनमेंट बोर्ड के लिए अनुकंपा नियुक्ति के नियमों का पता लगा कर उन का अध्ययन करना चाहिए और अपने पास के किसी ऐसे वकील से सलाह करनी चाहिए जो सेवा संबंधी मामंलों में पैरवी करते हों।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">स</span>रकार एक तरफा तरीके से अपने कर्मचारियों के अन्य वर्गों के लिए अनुकंपा नियुक्तियाँ जारी रखते हुए किसी एक वर्ग के लिए अनुकंपा नियुक्तियों को बन्द नहीं कर सकती। यदि सरकार ने इस तरह का कोई आदेश दिया भी है तो उसे उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी जा सकती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">आ</span>प को दिनांक 01.12.20011 के सीईओ के पत्र के आधार पर इस मामले में अनुकम्पा नियुक्ति के लिए उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका प्रस्तुत करनी चाहिए।</p>
<h4>Incoming search terms:</h4><ul><li>अनुकंपा</li><li>अनुकम्पा नौकरी हेतु कानून</li></ul>]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.teesarakhamba.com/archives/14946/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>वसीयत के आधार पर पूरे मकान के कब्जे का दावा करना चाहिए</title>
		<link>http://www.teesarakhamba.com/archives/14943</link>
		<comments>http://www.teesarakhamba.com/archives/14943#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 13 May 2012 00:16:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दिनेशराय द्विवेदी</dc:creator>
				<category><![CDATA[Civil Law]]></category>
		<category><![CDATA[Property]]></category>
		<category><![CDATA[दीवानी विधि]]></category>
		<category><![CDATA[संपत्ति]]></category>
		<category><![CDATA[possession]]></category>
		<category><![CDATA[Suit for Possession]]></category>
		<category><![CDATA[Will]]></category>
		<category><![CDATA[कब्जा]]></category>
		<category><![CDATA[कब्जे के लिए वाद]]></category>
		<category><![CDATA[वसीयत]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.teesarakhamba.com/?p=14943</guid>
		<description><![CDATA[-समस्या मेरे 77 वर्ष के पिता के नाम एक मकान का वसीयतनामा है जो उन के पिता ने उन के अवयस्क रहने के दौरान खरीदा था। वर्तमान राजस्व रिकार्ड में यह मकान मेरे पिता के स्वर्गीय पिता के नाम और नगरपालिका में मेरे चाचा के नाम दर्ज है। नगर पालिका रिकार्ड में उक्त मकान 10 [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h6><span style="color: #ff0000;">-समस्या</span></h6>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">मे</span>रे 77 वर्ष के पिता के नाम एक मकान का वसीयतनामा है जो उन के पिता ने उन के अवयस्क रहने के दौरान खरीदा था। वर्तमान राजस्व रिकार्ड में यह मकान मेरे पिता के स्वर्गीय पिता के नाम और नगरपालिका में मेरे चाचा के नाम दर्ज है। नगर पालिका रिकार्ड में उक्त मकान 10 वर्ष पहले मेरे पिता के नाम से दर्ज था क्यों कि वयस्क होने के बाद उन के पिता ने दर्ज करवा दिया था किन्तु चाचा ने रेकार्ड में हेराफेरी करवा कर नगर पालिका में अपना नाम दर्ज करवा लिाय और टैक्स भी अपने नाम से भरने लगे। यह बाद नगर पालिका का रेकार्ड देखने पर पता चली है। अभी कुछ समय पहले उन्हों ने उक्त मकान तोड़ दिया। हमारे उज्र करने पर चाचा पूर्व तय अनुसार इस का आधा हिस्सा देने की बात पर मुकर गए और उन्हों ने मकान बनवा लिया। हमें यह मकान कैसे मिल सकता है?</p>
<p style="text-align: right;"><span style="color: #000080;"><strong><span style="font-size: medium;">-अनिल नामदेव, छतरपुर, मध्यप्रदेश</span></strong></span></p>
<h6><span style="color: #008000;">समाधान-</span></h6>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;"><a href="http://www.teesarakhamba.com/wp-content/uploads/2012/05/मकान.jpg"><img class="alignright  wp-image-14895" title="मकान" src="http://www.teesarakhamba.com/wp-content/uploads/2012/05/मकान-300x300.jpg" alt="" width="154" height="154" /></a>आ</span>पने जो विवरण दिया है उस में यह कहा है कि राजस्व रिकार्ड में उक्त मकान आप के पिता के स्वर्गीय पिता अर्थात दादा के नाम दर्ज है। राजस्व रिकार्ड से आप का तात्पर्य क्या है यह समझ नहीं आया। जब भी कोई संपत्ति खरीदी जाती है तो उस का विक्रय पत्र उप पंजीयक के कार्यालय में दर्ज होता है। अक्सर उपपंजीयक का कार्य तहसीलदार या नायब तहसीलदार को दे दिया जाता है, जो राजस्व विभाग के अधिकारी हैं। शायद आप इसी कारण कह रहे हैं कि राजस्व रिकार्ड में मकान आप के दादा के नाम दर्ज है। उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत विक्रय पत्र/बैनामा किसी भी स्थाई संपत्ति के स्वामित्व का मूल प्रमाण है। इस से यह साबित किया जा सकता है कि उक्त मकान आप के दादा की स्वअर्जित सम्पत्ति थी।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">आ</span>प के दादा के देहान्त के उपरान्त आप के पिता को नगर पालिका में आवेदन कर के वसीयत के आधार पर उक्त मकान का नामान्तरण अपने नाम करवाना चाहिए था। लेकिन आप के पिता ने ऐसा नहीं करवाया। फिर भी वसीयत के आधार पर आप के पिता उस संपत्ति के स्वामी हैं। नगरपालिका में जो रिकार्ड दर्ज किया जाता है वह कभी भी किसी मकान के लिए स्वामित्व का सबूत नहीं है। उसे चुनौती दी जा सकती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">आ</span>प ने यह कहा है कि पूर्व तयशुदा के अनुसार चाचा ने मकान का आधा हिस्सा आप को न दे कर पूरे प्लाट पर अपना मकान बनवा लिया है। इस से यह प्रतीत होता है कि आप के पिता ने वसीयत को अधिक तरजीह न देकर यह माना कि पिता की संपत्ति दोनों भाइयों में आधी आधी बंटनी चाहिए। इस तरह आप के पिता आधी संपत्ति अपने भाई को स्वतः ही देने को तैयार थे। आप के पिता ने आधी संपत्ति छोड़ी किन्तु उस का नतीजा यह हुआ कि आप के चाचा ने पूरी संपत्ति कब्जा ली। जब चाचा ने उस मकान को तुड़वाया और नया बनवाने लगे तभी आप के पिता को उपपंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत (राजस्व रेकार्ड में दर्ज) विक्रय पत्र तथा वसीयत के आधार पर दीवानी न्यायालय में जा कर उन्हें उस भूखंड पर मकान बनाने से रोकना चाहिए था। लेकिन अब उन्हों ने मकान बना लिया  है। इस से यह साबित है कि मकान आप के पिता का होते हुए भी उस पर कब्जा आप के चाचा का है।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">व</span>र्तमान स्थिति के अनुसार आप के पिता को अपने स्वामित्व के मकान पर जिसे आप के चाचा ने कब्जा लिया है कब्जा प्राप्त करना है। इस के लिए आप के पिता को आप के चाचा के विरुद्ध मकान का कब्जा प्राप्त करने  के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत करना पड़ेगा। उस के द्वारा ही आप के पिता को उस मकान का कब्जा प्राप्त करना होगा। यदि आप समझते हों कि वसीयत के आधार पर आप के पिता का स्वामित्व सिद्ध करने में कठिनाई आ सकती है। क्यों कि वसीयत को साबित करने के लिए उन दो गवाहों में से कम से कम एक का जिन्हों ने वसीयत को तस्दीक किया है बयान न्यायालय में कराना होगा। वसीयत पुरानी होने के कारण हो सकता है वे गवाह जीवित ही नहीं रहे हों। तब आप को ऐसे गवाह का बयान कराना होगा जो आप के पिता और वसीयत को तस्दीक करने वाले दोनों गवाहों के हस्ताक्षरों को पहचनता हो।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">य</span>दि वसीयत प्रमाणित न की जा सकती हो तो उत्तराधिकार के आधार पर आप के पिता उस मकान के आधे हिस्से के हकदार हैं और वे आधे हिस्से के बँटवारे का दावा प्रस्तुत कर सकते हैं। यदि वे पूरे मकान के कब्जे के लिए वाद प्रस्तुत करते हैं तो पूरे मकान की वर्तमान कीमत के आधार पर या आधे हिस्से के बँटवारे के लिए वाद प्रस्तुत करते हैं तो उन्हें मकान की वर्तमान आधी कीमत पर न्यायशुल्क अदा करनी होगी। मेरी सलाह है कि उन्हें वसीयत के आधार पर पूरे मकान का कब्जा प्राप्त करने के लिए वाद प्रस्तुत करना चाहिए तथा विकल्प में बँटवारे के आधार पर आधे हिस्से के कब्जे के लिए भी राहत मांगनी चाहिए। इस मामले में आप सभी दस्तावेजों के साथ अपने नगर के किसी वरिष्ठ दीवानी मामलों के वकील से मिलें और उस से सलाह कर के दावा करवाएँ।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.teesarakhamba.com/archives/14943/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>चैक बाउंस के मामले में परिवाद प्रस्तुत करने में हुई देरी को न्यायालय क्षमा कर के प्रसंज्ञान ले सकता है</title>
		<link>http://www.teesarakhamba.com/archives/14937</link>
		<comments>http://www.teesarakhamba.com/archives/14937#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 12 May 2012 11:56:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>दिनेशराय द्विवेदी</dc:creator>
				<category><![CDATA[Law]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.teesarakhamba.com/?p=14937</guid>
		<description><![CDATA[समस्या- मेरे विरुद्ध धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम (N.I.Act) एक्ट का एक मुकदमा  चल रहा है उसमे मुझे चेक बाउंस होने का जो नोटिस दिया गया था वह नोटिस मुझे प्राप्त होने के ३० दिन बीत जाने के बाद मेरे ऊपर मुकदमा किया गया है। यह मुकदमा मुझे नोटिस प्राप्त होने की तिथि से ४५ [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h6 style="text-align: justify;"><span style="color: #ff0000;">समस्या-</span></h6>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">मे</span>रे विरुद्ध धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम (N.I.Act) एक्ट का एक मुकदमा  चल रहा है उसमे मुझे चेक बाउंस होने का जो नोटिस दिया गया था वह नोटिस मुझे प्राप्त होने के ३० दिन बीत जाने के बाद मेरे ऊपर मुकदमा किया गया है। यह मुकदमा मुझे नोटिस प्राप्त होने की तिथि से ४५ दिन के बाद न्यायालय में प्रस्तुत किया गया है।  क्या यह मुकदमा चलने योग्य है?</p>
<p style="text-align: right;"><span style="color: #000080;"><strong><span style="font-size: medium;">-मे.सलोनी ट्रेडर्स, फैजाबाद, उत्तर प्रदेश</span></strong></span></p>
<h6 style="text-align: justify;"><span style="color: #008000;">समाधान-</span></h6>
<h6 style="text-align: justify;"><span style="color: #ff0000;"><a href="http://www.teesarakhamba.com/wp-content/uploads/2012/04/cheque-dishonour1.jpg"><img class="alignright  wp-image-14882" title="cheque dishonour1" src="http://www.teesarakhamba.com/wp-content/uploads/2012/04/cheque-dishonour1.jpg" alt="" width="187" height="117" /></a></span></h6>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">य</span>ह सही है कि परक्राम्य विलेख अधिनियम की धारा 142 (ख) में यह उल्लेख है कि धारा 138 के अंतर्गत प्रस्तुत किया जाने वाला परिवाद वाद कारण उत्पन्न होने की तिथि से 30 दिनों की अवधि के भीतर प्रस्तुत किया जाना चाहिए। यदि इस अवधि के भीतर परिवाद प्रस्तुत नहीं किया जाए तो हो सकता है कि न्यायालय उस परिवाद पर संज्ञान न ले और परिवाद को आरंभिक स्तर पर ही निरस्त कर दे।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">ले</span>किन अधिनियम की धारा 142 (ख) के परन्तुक में न्यायालय को यह शक्ति भी प्रदान की गई है कि यदि परिवादी परिवाद को उक्त अवधि में प्रस्तुत न करने का कोई उचित कारण न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करे तो वह ऐसे परिवाद पर संज्ञान ले कर अभियुक्त के विरुद्ध समन जारी कर सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">इ</span>स तरह परिवाद प्रस्तुत करने में हुई देरी को न्यायालय द्वारा क्षमा किया जा सकता है और न्यायालय परिवाद पर प्रसंज्ञान ले सकता है। जब तक प्रसंज्ञान नहीं लिया जाता अभियुक्त न्यायालय में नहीं होता। इस तरह देरी क्षमा किए जाने का मामला केवल परिवादी और न्यायालय के बीच का ही है उस में अभियुक्त की कोई भूमिका नहीं है। लेकिन यदि परिवादी ने अपने परिवाद में देरी का कोई उचित कारण प्रदर्शित नहीं किया हो या देरी क्षमा करने के लिए कोई आवेदन प्रस्तुत नहीं किया हो और न्यायालय ने भी देरी पर कोई ध्यान नहीं देते हुए परिवाद पर प्रसंज्ञान ले लिया हो तो अभियुक्त प्रसंज्ञान लेने के आदेश को रिविजन न्यायालय में रिविजन आवेदन प्रस्तुत कर चुनौती दे सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><span style="font-size: xx-large;">आ</span>प के मामले में आप को देखना चाहिए कि परिवाद प्रस्तुत करने में हुई देरी को क्षमा किए जाने के लिए कोई उचित कारण प्रसंज्ञान लेने के पूर्व न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करते हुए देरी को क्षमा करने की प्रार्थना की गई थी अथवा नहीं की गई थी। यदि ऐसी प्रार्थना की गई थी और कारण उचित पाते हुए न्यायालय ने देरी को क्षमा करते हुए प्रसंज्ञान लिया था तो परिवाद चलने योग्य है। यदि ऐसा नहीं है तो आप प्रसंज्ञान लिए जाने वाले आदेश को रिविजन न्यायालय के समक्ष चुनौती दे सकते हैं। इस संबंध में आप को अपने वकील से सलाह कर के आगे कार्यवाही करनी चाहिए।</p>
]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.teesarakhamba.com/archives/14937/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
	</channel>
</rss>

